सोमवार, 24 नवंबर 2008

नवीन सागर की कविता

देना

जिसने मेरा घर जलाया
उसे इतना बड़ा घर
देना कि बाहर निकलने को चले
पर निकल न पाए

जिसने मुझे मारा
उसे सब देना
मृत्यु न देना

जिसने मेरी रोटी छीनी
उसे रोटियों के समुद्र में फेंकना
और तूफान उठाना

जिनसे मैं नहीं मिला
उनसे मिलवाना
मुझे इतनी दूर छोड़ आना
कि बारबार संसार में आता रहूँ

अगली बार
इतना प्रेम देना
कि कह सकूं : प्रेम करता हूँ
और वह मेरे सामने हो।

3 टिप्‍पणियां:

Bahadur Patel ने कहा…

yeh bahut hi pyari kavita hai.wah!

Bahadur Patel ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
Dev ने कहा…

First of all Wish u Very Happy New Year...